मन के मोती

कुछ जज्बात जो की कहे नही जाते ,, जिनके बारे में हम सोचते हैं कि वो सिर्फ मेरे साथ है लेकिन वास्तव में सभी उससे खुद को जुड़ा पाते हैं

26 Posts

2361 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 5460 postid : 1283317

धर्म और भावनाएं

Posted On 19 Oct, 2016 Contest, Junction Forum, Social Issues में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

अगर वेशभूषा ,उपासना -पद्धति,भाषा और रीति रिवाज रूपी संघात को धर्म का नाम दिया जाए तो उसकी भावनाएं भी आहत होंगी और फलस्वरूप हिंसा भी फैलेगी ! ‘धर्म’ शब्द संस्कृत के ‘धृ’ धातु से बना जिसका अर्थ है :-धारण करना ! महाभारत में महर्षि जाजालि ने भी कहा की धर्म वो है जो सबको संभाले , सबको धारित करे और जिससे सभी सुरक्षित हों ! जिस मनु स्मृति को आज राजनैतिक कारणों से घृणित बना दिया गया है उसमें भी धर्म के दस लक्षण बताये गये हैं यथा :-
“धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः।
धी र्विंधा सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।।”
यहाँ किसी वेशभूषा अथवा उपासना पद्धति का उल्लेख नही किया गया है ! आज इस धर्म शब्द को रिलिजन का पर्याय बताकर इसे हिंसा को प्रश्रय देने वाले शब्द के रूप में प्रतिष्ठित किया जा रहा है ! राजनीति को रिलिजन से मुक्त करने की मांग की जगह राजनीती को धर्म से अलग रखने की मांग उठती है ! रिलिजन क्या है ये भी देखना जरुरी होगा !
religion
rɪˈlɪdʒ(ə)n/
noun
noun: religion

the belief in and worship of a superhuman controlling power, especially a personal God or gods.

इससे आपको स्पष्ट हो जाना चाहिए की धर्म और रिलिजन में क्या अंतर है ! आप हिन्दू -मुस्लिम करते रहिये ! एक दूसरे की मान्यतावों का खंडन -मंडन करते रहिये किन्तु धर्म को इस चक्कर में विकृत मत कीजिए ! धर्म इन सब बातों से ऊपर है ! वो सबको धारित कर सकता है और किया हुआ है !
धर्म आपको जड़ नही बनाता वो आपको अधिकाधिक अन्वेषण को मुक्त करता है ! कोई भी पंथ हो वो जड़ हो चुकी मान्यतावों और परम्परावों से आगे बढे , सिर्फ धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं ये अलापकर अपने ही अनुयायियों का भावनात्मक शोषण ना करें ! समाज से डरना ठीक है लेकिन समाज और व्यक्ति में कौन मुख्य है , इस बहस में समाज को क्यों मुख्य बताया जाता है , समाज से डर की सीमा भी वही है ! बस उतना ही डरें जिससे समाज की उपयोगिता भंग न हो लेकिन अगर समाज एक परंपरा और रिवाज के नाम पर जड़ हो चला है तो उस डर को उतार फेंकिये ! अगर आपको धर्म समझना है या इसे लेकर कोई भी भ्रम हो तो एक सूत्र वाक्य रट लीजिये :-
“अगर किसी की भावनाएं आहत होती हैं तो वो धर्म नही है ! “



Tags:         

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran